भोजपुरी क सर्जनात्मकता (भोजपुरी आलेख)

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-परिचय दास

’’हमरा लग रहल बा कि हम कवनो विजन देख रहल बानी अउर तू ओह विजन में ना बाड़ू। बाकिर वोह विजन के देखत-देखत हमरा मन में एगो तन्मय उन्माद उमड़ रहल बा जवन धीरे-धीरे हमरा पूरा देह, पूरी आत्मा में छा रहल जात बा अउर हम एगो एनरजेटिक बदरी से घिर गइल बानी। हमरा भीतर से प्रकाश के प्रभा मण्डल फूट रहल बा। एह दशा में शब्द बिल्कुल बेकार बा, मुद्रा भी बेकार बा। बाकिर तू हमरा वोह तन्मय उन्माद के छू रहल बाडू-काहे से कि उ प्रभा मण्डल तोहरा के स्पर्श करत फइलत जा रहल बा अउर शब्द अउर मुद्रा से हट के एगो संवाद हो रहल बा। जहाँ हम ओह विजन से अभिभूत बानी, हमरा भितरियाँ स्थित तू हमरा उन्माद क देख रहल बाडू, छू रहल बाडू, महसूस कर रहल बाड़ू। तू वोह विजन के भी देख रहल बाड़ू। ऊ उन्माद तोहरा प छावल जाता। धीरे धीरे ऊ विजन अपने आप में महत्वपूर्ण ना रहेला। ऊ सिर्फ दूरस्थ पहाडी के तरह हो जाला जवन कि आपन तरफ आइल गूँज खातिर रिफ्लेक्टर क काम करेला। जवन महत्वपूर्ण बा, ऊ ह तन्मय उन्माद। विजन के सार्थकता ओह तन्मय उन्माद के उत्पन्न करे में बा। …… अउर एह समय लागऽता कि न हम अन्तर के मथ के उमड़ रहल शब्द से डरतानी अउर न चुपचाप रहल धड़कन से। दूनो एकही चीज हवें अउर दूनो में हमहीं बानीं।’’  -विजय देव नारायण साही

 

रचनाकार

भोजपुरी कबहूँ राजगद्दी के भाषा ना रहल। अजहू ऊ जनते क भाषा बा। पहिलहीं से ऊ सन्त आ भगत जन के भाषा रहल बा। भोजपुरी भाषा खाली संचरण के साधन ना हवे, अपितु सांस्कृतिक प्रवाहमयता के सेतु हवे। उ हमार अभिव्यक्ति के साथ-साथ हमार सौन्दर्य व आवेग के भी आकार देले। हमरा के निर्गुण से सगुण बनावले। भाषा हमार मनुष्यता के जीवित रखेले। सृजनात्मता के विकास में कल्पना के प्रेरित करे के पीछे भाषा के आवेग की भूमिका बीज रूप में रहेला।

जब हम एगो भाषा से दूसर भाषा में अन्तकरण करीला त ’सम्भवता’ के बावजूद बहुत कुछ छुट जाला। ऊ कवन अन्तराल हवे जवन भाषा के एह अद्वितीयता देला। इ अन्तर कहां से आवेला?

आपने एगो कविता से उदाहरण:

असम्भव अनुवाद
——————
प्रेम क अनुवाद ना हो सकेला कौनो भाखा में
न लइका के तुतलाहट क
न इतरात फूल के कमनीयता क
झरत पतइन के आख्यान क अनुवाद ना हो सकेला
न घनहर छाँह क
कम्प्यूटर में कम्पोज ना हो सकेला अँखियन में झलकत करुना
शब्दन में बयान ना हो सकेला जीवन भर के दुःख
अहैतुक।

भोजपुरी भाषा हमरा के जड़ तक ले जाले। भाषा सामाजिक पक्ष के साथे साथ अन्तः पक्ष के भी कलेवर देले। अतीत के समझे खातिर, वर्तमान से जूझत व भविष्य में प्रवेश के पीछे भाषा के महती भूमिका बा। सचमुच में आज भाषा पे विमर्श ‘पावर डिस्कोर्स’ के रूप में भी हो रहल बा। आज जहाँ अंग्रेजी दुनिया भर के द्वार खोल रहल बा, वहीं अनेक बार दूसर भाषा ओकर वाणिज्यिक (आर्थिक), दबावकारी हैसियत के नीचे दबल महसूस करेला। अंग्रेजी के एकछत्र शासन के बदले विश्व के अन्य भाषा के विकास के दरवाजा भी बराबरी से खुले के चाहीं। एक जइसन विचारधारा, एक जइसन संस्कृति, एक जइसन भाषा-आदि विचार लोकतान्त्रिकता व बहुवचनात्मता के विरुद्ध बा। एह में विकेन्द्रीयता होखे के चाहीं। ’विविधता’ मनुष्य जाति के शक्ति हवे। एकरा के ‘एक ही तरह’ या ’कठोर एकरूपता’ से ना जकड़े के चाहीं। कवनो भी राष्ट्र के आपन बात आपन भाषा में कहे से जवन आत्मसम्मान मिलेला, उ कहल नइखे जा सकत। एकर अर्थ कट्टरता के सृष्टि ना हवे या दूसर के निषेध नइखे। अन्यतर वैश्विक भाषा अपनावल व ओकरा के सम्मान दीहल भी आवश्यक बा अउर उ हमनीं के करीना जा।

साहित्य के अलावा मानविकी, विज्ञान तथा दूसर क्षेत्र में भी भारतीय भाषा के प्रयोग होखे के चाही। कवनो देश के स्वाधीनता के असली अर्थ त इहे होला। जब हम कवनो भाषा के प्रयोग करीना त ओहमें हमार इयाद होला, लालित्य होला। भाषा के गतिकी एही बात पर आधृत बा कि ओहमें ’हम’ कहाँ तक ‘उपस्थित’ बानी। भारत बहुभाषिक-बहुसांस्कृतिक समाज के प्रतिनिधित्व करेला। ईहे एकर शक्ति ह। इ कुरुप तब बन जाई, जब भषा के कुरुचिपूर्ण दुराग्रह होखे। आधुनिक समय में जवना के हम ’हिन्दी’ कहनीं, उ ’खड़ी बोली’ के परिमार्जित रूप हवे। हमनीं के एह पर विचार करे के होखी कि आधुनिक चाहे समकालीन हिन्दी साहित्य से भोजपुरी चाहे मैथिली (या दूसर) क्रियापदन के समकालीन रचना काहे विरत कर दीहल गइल।

एह पंक्तियन के लेखक भोजपुरी आ हिन्दी खड़ी बोली दूनो में लिखेलन। दूनो के प्रति उनकर मन में आदर बा। भोजपुरी अउर खड़ी बोली दूनो मिलकर साथ चलिहे सन बाकिर भोजपुरी के आपन जगह आ सम्मान अभीष्ट बा। राष्ट्रियता के नया सिरा से समझल आ दुसरन खातिर ’स्पेस’ तलासलो भाषिक गतिकी के एगो महत्वपूर्ण पहलू हवे। उहाँ बहुवचनात्मकता आवश्यक बा। भाषा के दम्भपूर्ण अतिवाद भी व्यर्थ बा। भाषा के पक्ष आत्मा के आवेग के हवे।

जटिल स्वप्न, इच्छा आ छन के एकाग्र हमार भाषा हमें ’स्वत्व’ देले। भाषा हमनी के जीवन देला। भाषा हमनी के स्मृति देवेला। ऊ हमनही के होखले क अभिकेन्द्रक हवे।

ईहाँ- ऊहाँ के बाति घुमा-फिरा के काहें कहीं !
पेड़- पालो वाले ताल नदी में
उठेलीं : लहर, लहर, लहर
प्रान के भाव-क्षेत्र में
जल के गहनता में
कुछ हिलेला
रउवां मालूम नइखे
एही से हमनी के कौनों संधान
सत्य सन्धानबा – आत्मा के ’उजास क भाषा’
चहक-चहक चाँदनी निर्मल प्रसन्न
सपना तिर जाला
अँखियाँ के अन्त: स्थल में
तोहरा परिचित
दिन-रात
आसमान क वितान-विस्तार
एगो अँगना के कोना में
कौनों पुरान बिरिछ के छाया में बजेले लोकधुन।  (लेखक)

पश्चिमी किस्म के सभ्यता, स्थिरता व प्रगति के बिल्कुल ओही रूप में स्वीकार करे के चेष्टा अन्ततः भोजपुरी मानस क आपन उपनिवेश बना लिही। आपन जड़ के महता के बचा के रखे के चाही।

दुनिया के कई गो देसन में भोजपुरी बोलल जाला। भारत के अलावा सूरीनाम, नेपाल, फिजी, त्रिनिदाद, माॅरिशस देश में भोजपुरी व्यवहार में बरतल जाला। कबीर, भीखन राम, धरनी दास, टेकमन राम, पवहारी, कीनाराम आदि महत्वपूर्ण भोजपुरी भक्त कवि रहलन। शंकरदेव के भाषो में भोजपुरी के एगो रूप देखल जा सकल जाला। गुरु गोरखनाथ के भाषा में भोजपुरी के आदि रूप देखल जा सकेला। उपरान्त,  तेगअली, बिसराम, दूधनाथ उपाध्याय आदि आवेलन। रघुवीर नारायण, मनोरञ्जन प्रसाद सिन्हा, चंचरीक एकर मुख्य भूमिका कवि के रूप में अदा कइलन। भिखारी ठाकुर, महेन्द्र मिश्र लिखत लिखत लोगवन के कण्ठहार बन गइलन। गद्य में रविदत शुक्ल, राहुल सांकृत्यायन, रामेश्वर सिंह काश्यप, रामनाथ पाण्डेय आदि लोग महत्वपूर्ण बाड़न। विवेकीराय, चन्द्रभूषण सिन्हा, दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, सत्यदेव ओझा आदि साहित्यकारन के योगदान स्वीकार कइल जाई। उदयनारायण तिवारी, कृष्णदेव उपाध्याय शोध के माध्यम से भोजपुरी भाषा-साहित्य के ढेर सगरो पहलू प्रस्तुत कइले बाड़न। समकाल में ढेर सारा रचनाकार रचनारत बाड़न। समकालीन लोगन पर लिखल आज आवश्यक आ कुशल सृजनात्मक कार्य ह। वोह लोगन पर फेरु कबहीं अलग से जल्दिये लिखाई। ऊ अपने भाषा में बेहतर रचना सृजित कर रहल बाड़न।

भोजपुरी के वाचिक परम्परा बहुत महत्वपूर्ण बा। एह में सोरठी, बृजभार, सारंगा सदावृज, कुँअर विजयमल, बिहुला आदि लोकगाथा जनजीवन में रचल बसल बा। डाॅ. सत्यव्रत सिन्हा के एह पर विशेष शोध कार्य बा। महादेवप्रसाद सिंह ’घनश्याम’ इनकर संकलित सम्पादित कइले बाड़न। भोजपुरी के मिठास पूरा दूनिया में प्रसिद्ध बा। हर भाषा के एगो मिठास होला। भोजपुरी एगो कर्णप्रिय भाषा बा। एह भाषा में बनल फिल्म आपन विश्वबजार रखेला। एह भाषा के फिल्म के बजार हिन्दी के टक्कर के बा। ’बिदेसिया’, ’गंगा मइया तोंहे पियरीचढ़इबों’, दंगल आदि फिल्म शास्त्रीय मानल जाला।

भोजपुरी लोगन भारत, नेपाल, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनीदाद, फिजी, दक्षिण अफ्रीका आदि देशन में आपन श्रम से फूल खिलइले बाड़न।

भोजपुरी लोगन द्वारा स्वयं के सम्बन्ध के विश्व के साथ देखल जाइल कवनो यान्त्रिक प्रक्रिया ना हऽ। जवनआर्थिक ढाँचे के माध्यम से राजनीतिक अउर अन्य संस्था के उदय के साथ व क्रमिक रूप से संस्कृति, मूल्य, चेतना व अस्मिता के साथ सुव्यवस्थित चरण व छलाँग में घटित होखे। संघर्षशील वर्ग राष्ट्र के लिए शिक्षा मुक्ति का एगो उपकरनो बा। ई परस्पर विरोधी संस्कृतियन के बीच आपन विवेकशील विश्वदृष्टि के वाहक बा। पश्चिमी किस्म के सभ्यता, स्थिरता व प्रगति के बिल्कुल ओही रूप में स्वीकार करे के चेष्टा अन्ततः भोजपुरी मानस क आपन उपनिवेश बना लिही। आपन जड़ के महता के बचा के रखे के चाही। भोजपुरी मे एगो संवेदनशील मनुष्य के समतामूलक समाज के कल्पना बा, लेकिन एकर साहित्य नारा के उद्‌घोष नइखे। भोजपुरी खातिर साहित्य नारा नइखे। सर्जनशीलता खातिर अन्ततः संवेदना अउर चेतना हऽ। निवासी व प्रवासी के रूप में भोजपुरी लोगन समूचा विश्व वितान रचले बाड़न। माॅरिशस में आपन खून पसीने से गंगा व ओकर संस्कृति रचले बाड़न। सूरीनाम, नेपाल, गुयाना, त्रिनीदाद, फिजी, दक्षिण अफ्रीका आदि देशन में आपन श्रम से फूल खिलइले बाड़न।

हमनी के जानत बानी जा कि उधार में लीहल भाषा या दूसर के अन्धानुकरण से आपन साहित्य व संस्कृति के रचना विकसित करल सम्भव नइखे। हम भाषाई रूप से कभी कट्टर ना हनीं, काहे कि भोजपुरी जन के ई मानल बा कि भाषा आ साहित्य के बीच सांवादिकता बनल रहे के चाही। आपन वाचिक वलिखित परम्परा के गर्भ से रत्न-उत्खनन खातिर अब त चेष्टाशील होखे के चाही। संस्कृति के विविध क्षेत्रन में पुनर्जागरण के अगाध सृष्टि होखे के चाहीं।

भोजपुरी में रचना शाब्दिक बिम्ब के रूप में आत्म व जनसंघर्ष के रचनात्मक चेतना के न केवल स्वीकृति ह, अपितु संस्कृति के आत्म पहचानो बा।

भाषा के भण्डार विज्ञान, दर्शन, तकनीक व मनुष्य के अउर प्रयास खातिर खोलल जरूरी बा। शब्द-कौतुक एगो कला ह, लेकिन संस्कृति के प्रवाह शब्दन में मात्र अमूर्त सार्वभौमिकता से सम्भव नइखे। यदि हम वास्तव में चाहत बानी कि हमार बचन व हमार स्वयं के अभिव्यक्ति के लय प्रकट होखे तथा प्रकृति के साथ हमार रचाव के संवर्द्धन होखे त मातृभाषा भोजपुरी में सर्जना पर बल आवश्यक बा। इ कार्य अन्धविचार से परिचालित ना होखे के चाही। आपन भाषा व परिवेश के बीच स्थापित सामञ्जस्य के प्रस्थान विन्दु मान के दूसर भाषा सीखल जा सकेला। आपन भाषा, व्यक्तित्व व आपन परिवेश के बारे में कवनो ग्रन्थि पाले बिना अन्य साहित्य व संस्कृति के मानवीय, लोकपरक व सकारात्मक तत्त्व के आनन्द उठावल जा सकत बा। भोजपुरी विश्व दूसर साहित्य व भाषा से हमार रिश्ता रचनात्मक होखे के चाहीं न कि दबाव भरल उपनिवेशपरक। अन्ततः हमार संस्कृति व बिम्ब के सार्थक आधार अपने भाषा में सम्भव बा। समकालीनता के बीच स्वस्थ सम्बन्ध होखे के चाहीं, जवन कि मूल से ही सम्भव बा।

भोजपुरी में रचना शाब्दिक बिम्ब के रूप में आत्म व जनसंघर्ष के रचनात्मक चेतना के न केवल स्वीकृति ह, अपितु संस्कृति के आत्म पहचानो बा। एह से गर्भ तक पहुँच कर रत्न-उत्खनन के सम्भावना अउर प्रबल होखी। भोजपुरी व साहित्य न केवल भारत अपितु विश्व में भविष्यमुखी दृष्टि रखेला। भोजपुरी के भविष्य आपन सर्जनात्मकता के कारण उज्जवल बा, बस वोम्मे रचत रहे के चाही।

(मऊनाथ भञ्जन, उत्तर प्रदेश। हाल : नयी दिल्ली।)

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