मए भूमिपुत्र हओँ (राना थारू)

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-इन्द्र चौधरी

रचनाकार

सभ्यताकी गोँणी दारतपेती
भूगोलकी बेँह्रा नबँधो युगमे
मए सभ्यता और बेँह्रासे बँधो रानाथारू
एक आदिवासी रहओँ।

बादरमे बाज उरनसे पहिले
नदियामा नक्टा दिखानसे पहिले
मए भूमिपुत्र रानाथारू
स्वतन्त्र रहओँ।

बे आगारसे आइँ, पछारसे आइँ
दक्खिन और सिरेसे फिर आइँ
अबोध आदमी मए ता,
बे मोके चिन्लैँ
मए बिनके चिन्नापाओ
बे ता बाज रहयँ, नग्टा रहयँ
बिनकी पेटमे छुरिया रहए, आँखीमे बिष
मिर पौलीले खुँटी ठोँकी जब,
आँखीमे बिष सिँची जब
और जब मै नेब्ग ना पाओ

मिर सबए स्वतन्त्रता हरातय गओ
धिरे धिरे,

अइसे सब कुछ लुट्बान बारो अबोध आदमी मए
आज तगरो हुइगओ हौँ,
समय बदलो, युग बदलो, सब कुछ बदल गओ
पर,
अहँ, बाज और नकटा ना बदलीँ
अभैयो मए
आदिवासी हौँ,
भूमिपुत्र हौँ।।

(शुक्लाफाँटा-१२, कञ्चनपुर। हाल : काठमाडौँ)

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